भारत प्राचीन काल से ही वैज्ञानिक रूप से बहुत संपन्न और विकसित देश रहा है!
सिद्ध योगी या साधु या तांत्रिक सब के साधन अलग अलग होते हैं पर साध्य यानी लक्ष्य एक। आत्मज्ञान! कई भीषण परिस्थितियों का सामना करने के बाद ही ये अपने लक्ष्य तक पहुंच पाते हैं।
इसके लिए इन सिद्ध योग पुरुषों ने कई रहस्य ऐसी गोपनीयता से छुपा रखे हैं जो ये केवल योग्य साधकों को ही सौंपते हैं। ये बहुत ही संरक्षित रहस्य हैं।
जो इन क्षेत्रों में बहुत गहराई में उतर पाते हैं वही जान पाते हैं। और गहराई में वही उतर पाते हैं जिनका मन साफ हो या जिनपर ईश्वर की कृपा हो। इस प्रकार से ये राज़ सदियों से गुप्त रखे गए हैं।
1. क्या आपने कभी सोचा है कि ये अघोरी या साधु जंगलों में, पहाड़ों में, हिमालय की गुफाओं में सर्दी गर्मी किसी भी मौसम में निरंतरता से साधनालीन कैसे रहते हैं? कैसे बिना कम्बल बिना हीटर बिना कूलर -एसी के ये हर मौसम, चाहे भीषण गर्मी हो या कड़कड़ाती सर्दी ये इतने शांत, इतने अप्रभावित कैसे होते हैं?
ये परिणाम है निरंतर अभ्यास कर के कुछ खास योग क्रियाओं पर पकड़ हासिल करने का। हमारे शरीर में तीन मुख्य नाड़ियां होती हैं। इंगला, पिंगला और सुषुम्ना। ये सिद्ध पुरुष इनमें इंगला और पिंगला नाड़ियों को अपने स्वर से जगा कर शरीर को शीतल या गर्म रखते हैं। इंगला चंद्रमा के सदृश होता है इसीलिए चन्द्र नाड़ी भी कहलाता है और पिंगला सूर्य नाड़ी। ये योगी ठंड में दाईं नाड़ी सूर्य स्वर चला लेते हैं जिससे शरीर गर्म रहता है और भीषण गर्मी में शरीर को ठंडा रखने के लिए बाईं नाड़ी चन्द्र स्वर चला लेते हैं।
प्राणायाम एक चमत्कारी खोज है। इसका एक और अभ्यास है कुंभक क्रिया। यह इतनी प्रभावी है कि बर्फ में बैठ जाओ तो बर्फ पिघल जाए इतनी गर्मी भर जाती है शरीर में! और भी कई ऐसी क्रियाएं और सिद्धियां हैं।
तो ये है हर मौसम को सह लेने का रहस्य।
2. निर्गम और वीरान जगहों पर रहने के कारण कभी कभी कई कई दिनों तक खाना पीना नहीं मिलता। फिर भी ये साधु इतने स्वस्थ कैसे रहते हैं?
हमारे भारत के ऋषि मुनियों ने आदिकाल में ही कई जीवों पर शोध कर के बहुत उच्च स्तर की विधियां ढूंढ निकाली थीं। अगर आपने अपने आस पास के जीवों पर गौर किया होगा या नैट जियो ध्यान से देखा होगा तो जानते होंगे कि कई जीव हैं जो बिना खाए पिए कई कई मौसम और कुछ कई कई साल गुजार लेते हैं। जैसे कि कुछ मेंढ़क प्रजातियां अक्सर सर्दियों में कुछ नहीं खाती। भालू कई महीने बिना कुछ खाए पिए रह सकते हैं। सांप तो सिर्फ हवा पर कई दिन स्वस्थ और ज़िंदा रह सकते हैं। ऐसे ही कई जीव हैं। तो इन जीवों से ही सीख कर हमारे सिद्ध पुरुषों ने आसपास के वातावरण से चेतन ग्रहण करने या चयापचय दर घटा बढ़ा के बिना खाए पिए भी स्वस्थ रहने की तकनीक विकसित कर ली थी। यही प्राचीन विद्या ये साधक इस्तेमाल करते हैं।
इसके अलावा एक खेचरी क्रिया होती है जिसमें जिह्वा को पीछे कपाल में ले जाया जाता है। कहते हैं कि हमारे अपने अंतर में अमृत है और इस क्रिया से अमृत पान कर सकते हैं और कुछ भौतिक वस्तु खाने पीने की ना जरूरत होती है ना ही इच्छा! बहुत सिद्ध पुरुष ही इस क्रिया को जानते हैं और सिखा सकते हैं।
ये हमारी विद्या है। विज्ञान है। कुछ भी चमत्कार और अंधविश्वास नहीं।
3. दुर्गम स्थानों पर रहना - कई बार आपने देखा सुना होगा कि साधक, तांत्रिक आदि गुफाओं में रहते हैं या पहाड़ों पर अत्यधिक ऊंचाई पर आश्रम या कुटिया बना कर रहते हैं। ऐसे स्थानों पर तो हवा का प्रवेश भी बहुत दुर्गम और अति दुर्लभ होता है फिर ये कैसे जीवित रहते हैं? इसका जवाब भी प्राचीन अनुसंधानों में छुपा है। अति प्राचीन काल से ही हमारे मुनियों ने कम हवा में भी सांस लेने की कला सांपों से, कछुए से और ऐसे ही कई जीवों से सीखी। ये जानवर सूक्ष्म हवा में भी धीरे धीरे और कई कई घंटों तक सांस लेते और सांस छोड़ते रहते हैं। ऐसी कई कलाएं हैं।
ये विद्याएं ऋषियों मुनियों से उनके शिष्यों और योग्य साधकों तक हस्तांतरित होती आयी हैं।
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