ये प्रश्न जितना रोचक है, उसका उत्तर उससे भी कहीं अधिक रोचक है। यहाँ पर में संक्षेप में उत्तर दे रहा हूँ। मेरा ये विश्वास है कि इस जानकारी को जानने के बाद आप अपने हिन्दू धर्म पर गर्व करेंगे।
आपको जानकर महान आश्चर्य होगा कि वर्तमान विश्व के नक्शे का वर्णन आज से सहस्त्रों वर्ष पूर्व महर्षि वेदव्यास ने दे दिया था। इसका वर्णन महाभारत के भीष्म पर्व में महर्षि वेदव्यास और धृतराष्ट्र के संवाद में मिलता है। भीष्म पर्व के आरंभ में एक श्लोक है:
सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन। परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः।। यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः। एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले।। द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।
अर्थात: हे कुरुनन्दन! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान शश (खरगोश) दिखायी देता है।
इसी श्लोक को पढ़ कर ११वीं सदी में श्री रामानुजाचार्य ने महर्षि व्यास द्वारा वर्णित उस नक़्शे को बनाया था।
इस चित्र को यदि उल्टा कर दिया जाये तो ये बिलकुल हमारी पृथ्वी का नक्शा बन जाता है।
और जैसा कि महर्षि व्यास ने कहा है, इसे पृथ्वी के दो अंशों में बांटा जाये तो ये पूर्णतः हमारी पृथ्वी का नक्शा बन जाता है।
ये इस बात को सिद्ध करता है कि हिन्दु धर्म पुरातन होते हुए भी कितना वैज्ञानिक है। इसीलिए पश्चिम की ओर दौड़ना छोड़ें और अपने धर्म को मजबूती से पकड़े रहें।
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