Friday, November 20, 2020

क्या आपने कभी किसी गर्भवती आदमी के बारे में सुना है ?!

अच्छा, आज उन्नत तकनीकों के कारण यह संभव हो सकता है लेकिन 1999 में ऐसा नामुमकिन था?

मिलिए संजू भगत से- प्रेग्नेंट मैन

केवल 2 साल की उम्र में, उन्होंने गर्भावस्था के सबसे अधिक दिखाई देने वाले संकेत जो कि सबसे बड़ा पेट को दिखाया। जैसे-जैसे वे बूढ़ा होते गए वैसे-वैसे उनका पेट फूलता गया। गाँव वाले उसे हमेशा चिढ़ाते थे कि वह नौ महीने का गर्भवती है। 1999 के जून में जब संजू 36 साल के थे, तब पेट का फूलना उनके लिए मुश्किल हो गया और इसलिए उन्हें तुरंत सर्जरी के लिए अस्पताल ले जाया गया।

डॉक्टरों ने सोचा कि यह ट्यूमर का मामला हो सकता है। थोड़ा वे जानते थे कि आगे क्या था! सर्जरी के दौरान, डॉक्टर ने कहा कि वह अंदर बहुत सारी हड्डियों को महसूस कर रहे थे, फिर एक अंग बाहर आया और फिर एक भ्रूण के पूरे उत्परिवर्तित शरीर बाहर निकला। डॉक्टरों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

डॉक्टरों ने पाया कि संजू भगत को दुनिया की सबसे विचित्र चिकित्सा स्थितियों- भ्रूण में भ्रूण का सामना करना पड़ा। यह एक अत्यंत दुर्लभ असामान्यता विकार है, ये तब होता है जब एक भ्रूण अपने जुड़वां के अंदर फंस जाता है। इसलिए, भगत 36 वर्षों से अपने शरीर में जुड़वा बच्चों को लिए जा रहे थे!

चूंकि भगत के पास जरायुनाल (स्वाभाविक रूप से) नहीं थी, भ्रूण सीधे उनकी रक्त आपूर्ति से जुड़ा था। जब डॉक्टर आमतौर पर हस्तक्षेप करते हैं। आम तौर पर, दोनों जुड़वां बच्चे मर जाते हैं, लेकिन भगत के मामले में वह अपने ही परजीवी जुड़वां के साथ रहता था।

सर्जरी के ठीक बाद, भगत का दर्द और सांस लेने में असमर्थता गायब हो गई और वे तुरंत ठीक हो गये। उनका वजन काफी कम हो गया। वह अब सामान्य जीवन जी रहे है।

लेकिन पूरी दुनिया अब उन्हें "भारत के गर्भवती पुरुष" के रूप में याद करेगी।

किस मन्दिर में पानी के दीपक जलाये जाते हैं और क्या सच में ऐसा चमत्कार होता है?

ना जाने ये कैसे अद्भुत चमत्कार है। जी हाँ, आप भी ये जानकर चौक जाएंगे। हैरानी की बात तो ये है कि हम जिस मन्दिर के बारे में बताने जा रहे है वहाँ पानी जे दीपक जलाये जाते है।

भारत में और भारतीय संस्कृति में ऐसी बहुत सी चीज़े हैं जो कि हमें अंधविश्वास की ओर मोड़ देती है । आज भी यहां रहने वाले कई जाति व समुदाय ऐसी परम्पराओं को मानते है जो कि देखा जाए तो बिल्कुल भी उचित नहीं है । लेकिन इसकी आड़ में हम सभी चीज़ो को अनदेखा नहीं कर सकते , जैसे कि इस मंदिर को जहां वर्षों से लोग पानी के दीपक जलाते हैं ।

अद्भुत ! इस मंदीर में जलाया जाता है पानी का दीपक

जाने कैसा है ये चमत्कार सुनने में ये भले ही एक मज़ाक या बेतुकी सी बात लगती है मगर यह एक सच है जिसे आमतौर पर लोग चमत्कार का नाम दे देते हैं । कहने को तो यहां हर दिन कोई न कोई चमत्कार देखने को मिल ही जाता है लेकिन हम यहां जिस मंदिर की बात कर रहें है वो अपने - आप में ही एक अद्भुत बात है ।

अद्भुत ! इस मंदीर में जलाया जाता है पानी का दीपक , जाने कैसा है ये चमत्कार दरअसल , हम यहां बात कर रहें हैं मध्य प्रदेश के मालवा जिले के नलखेड़ा तहसील से कुछ 15 किलोमीटर दूर कालीसिंध नदी के किनारे बसे एक प्रचीन मंदिर की जिसे गड़ियाघाट वाली माताजी के मंदिर के नाम से जाना जाता है ।

मान्यता है कि यहां लोग घी या तेल की बजाए पानी के दीपक जलाए जाते हैं । हैरानी की बात तो ये हैं कि यहां सालों से माता जी के चरणो में तेल का ही दीपक जलाया जाता था । लेकिन मंदिर के पुजारी के मुताबिक एक दिन पुजारी के सपने में खुद मातजी आईं और उन्होंने पानी का दीपक जलाने को कहा ।

फिर क्या था सुबह उठकर पुजारी ने बिल्कुल ऐसा ही किया , एक दीपक लिया और उसमें पानी भरकर बाती रख दी । माता का नाम लेते हुए जैसे कि उन्होंने माचिस बाती के पास रखी तो दीपक से लो जल उठी।

मंदिर के पुजारी का कहना है कि जब उन्होंने लोगों को इस बारे में बताया तो किसी ने भी उनकी बात पर विश्वास नहीं किया लेकिन जब उन्होंने सभी के आंखों के सामने पानी से दीपक जलाया तो सभी भक्त दंग रह गए ।

धीरे - धीरे बात पूरे गांव में फैली और फिर पूरे देश में , तभी से यहां जो कोई भी आता है पानी के जलते दीये को देखकर दंग रह जाता है । ये अपने आप में एक चमत्कार ही तो है वरना एक जलता दीपक पानी के पास आते ही बुझ जाता है , ऐसे में पानी से दीपक जलना तो मानो असंभव ही है । लेकिन यहां ये असंभव कार्य रोज़ाना संभव होता है ।

अघोरी इतनी विकट परिस्थितियों में भी जीवित कैसे रह लेते हैं? क्या आप सिद्ध योगियों या साधुओं के कुछ अत्यंत रहस्यमई भेद जानते हैं?

 भारत प्राचीन काल से ही वैज्ञानिक रूप से बहुत संपन्न और विकसित देश रहा है!

सिद्ध योगी या साधु या तांत्रिक सब के साधन अलग अलग होते हैं पर साध्य यानी लक्ष्य एक। आत्मज्ञान! कई भीषण परिस्थितियों का सामना करने के बाद ही ये अपने लक्ष्य तक पहुंच पाते हैं।

इसके लिए इन सिद्ध योग पुरुषों ने कई रहस्य ऐसी गोपनीयता से छुपा रखे हैं जो ये केवल योग्य साधकों को ही सौंपते हैं। ये बहुत ही संरक्षित रहस्य हैं।

जो इन क्षेत्रों में बहुत गहराई में उतर पाते हैं वही जान पाते हैं। और गहराई में वही उतर पाते हैं जिनका मन साफ हो या जिनपर ईश्वर की कृपा हो। इस प्रकार से ये राज़ सदियों से गुप्त रखे गए हैं।

1. क्या आपने कभी सोचा है कि ये अघोरी या साधु जंगलों में, पहाड़ों में, हिमालय की गुफाओं में सर्दी गर्मी किसी भी मौसम में निरंतरता से साधनालीन कैसे रहते हैं? कैसे बिना कम्बल बिना हीटर बिना कूलर -एसी के ये हर मौसम, चाहे भीषण गर्मी हो या कड़कड़ाती सर्दी ये इतने शांत, इतने अप्रभावित कैसे होते हैं?

ये परिणाम है निरंतर अभ्यास कर के कुछ खास योग क्रियाओं पर पकड़ हासिल करने का। हमारे शरीर में तीन मुख्य नाड़ियां होती हैं। इंगला, पिंगला और सुषुम्ना। ये सिद्ध पुरुष इनमें इंगला और पिंगला नाड़ियों को अपने स्वर से जगा कर शरीर को शीतल या गर्म रखते हैं। इंगला चंद्रमा के सदृश होता है इसीलिए चन्द्र नाड़ी भी कहलाता है और पिंगला सूर्य नाड़ी। ये योगी ठंड में दाईं नाड़ी सूर्य स्वर चला लेते हैं जिससे शरीर गर्म रहता है और भीषण गर्मी में शरीर को ठंडा रखने के लिए बाईं नाड़ी चन्द्र स्वर चला लेते हैं।

प्राणायाम एक चमत्कारी खोज है। इसका एक और अभ्यास है कुंभक क्रिया। यह इतनी प्रभावी है कि बर्फ में बैठ जाओ तो बर्फ पिघल जाए इतनी गर्मी भर जाती है शरीर में! और भी कई ऐसी क्रियाएं और सिद्धियां हैं।

तो ये है हर मौसम को सह लेने का रहस्य।

2. निर्गम और वीरान जगहों पर रहने के कारण कभी कभी कई कई दिनों तक खाना पीना नहीं मिलता। फिर भी ये साधु इतने स्वस्थ कैसे रहते हैं?

हमारे भारत के ऋषि मुनियों ने आदिकाल में ही कई जीवों पर शोध कर के बहुत उच्च स्तर की विधियां ढूंढ निकाली थीं। अगर आपने अपने आस पास के जीवों पर गौर किया होगा या नैट जियो ध्यान से देखा होगा तो जानते होंगे कि कई जीव हैं जो बिना खाए पिए कई कई मौसम और कुछ कई कई साल गुजार लेते हैं। जैसे कि कुछ मेंढ़क प्रजातियां अक्सर सर्दियों में कुछ नहीं खाती। भालू कई महीने बिना कुछ खाए पिए रह सकते हैं। सांप तो सिर्फ हवा पर कई दिन स्वस्थ और ज़िंदा रह सकते हैं। ऐसे ही कई जीव हैं। तो इन जीवों से ही सीख कर हमारे सिद्ध पुरुषों ने आसपास के वातावरण से चेतन ग्रहण करने या चयापचय दर घटा बढ़ा के बिना खाए पिए भी स्वस्थ रहने की तकनीक विकसित कर ली थी। यही प्राचीन विद्या ये साधक इस्तेमाल करते हैं।

इसके अलावा एक खेचरी क्रिया होती है जिसमें जिह्वा को पीछे कपाल में ले जाया जाता है। कहते हैं कि हमारे अपने अंतर में अमृत है और इस क्रिया से अमृत पान कर सकते हैं और कुछ भौतिक वस्तु खाने पीने की ना जरूरत होती है ना ही इच्छा! बहुत सिद्ध पुरुष ही इस क्रिया को जानते हैं और सिखा सकते हैं।

ये हमारी विद्या है। विज्ञान है। कुछ भी चमत्कार और अंधविश्वास नहीं।

3. दुर्गम स्थानों पर रहना - कई बार आपने देखा सुना होगा कि साधक, तांत्रिक आदि गुफाओं में रहते हैं या पहाड़ों पर अत्यधिक ऊंचाई पर आश्रम या कुटिया बना कर रहते हैं। ऐसे स्थानों पर तो हवा का प्रवेश भी बहुत दुर्गम और अति दुर्लभ होता है फिर ये कैसे जीवित रहते हैं? इसका जवाब भी प्राचीन अनुसंधानों में छुपा है। अति प्राचीन काल से ही हमारे मुनियों ने कम हवा में भी सांस लेने की कला सांपों से, कछुए से और ऐसे ही कई जीवों से सीखी। ये जानवर सूक्ष्म हवा में भी धीरे धीरे और कई कई घंटों तक सांस लेते और सांस छोड़ते रहते हैं। ऐसी कई कलाएं हैं।

ये विद्याएं ऋषियों मुनियों से उनके शिष्यों और योग्य साधकों तक हस्तांतरित होती आयी हैं।


क्या आप 1899 के छप्पन्या के वीभत्स काल के बारे में बता सकते हैं जिसमें एक माँ ने अपनी संतान को जन्म देकर खुद ही खा लिया था?

 


"भागीरथ"

वर्ष 1899-1900 में राजस्थान में एक बदनाम अकाल पड़ा था...

विक्रम संवत १९५६ (1956) में ये अकाल पड़ने के कारण राजस्थान में इसे छप्पनिया-काळ कहा जाता है...

एक अनुमान के मुताबिक इस अकाल से राजस्थान में लगभग पौने-दो लाख लोगों की मृत्यु हो गयी थी...
पशु पक्षियों की तो कोई गिनती नहीं है...
लोगों ने खेजड़ी के वृक्ष की छाल खा-खा के इस अकाल में जीवनयापन किया था...

यही कारण है कि राजस्थान के लोग अपनी बहियों (मारवाड़ी अथवा महाजनी बही-खातों) में पृष्ठ संख्या 56 को रिक्त छोड़ते हैं...
छप्पनिया-काळ की विभीषिका व तबाही के कारण राजस्थान में 56 की संख्या अशुभ मानी है....

इस दौर में बीकानेर रियासत के यशस्वी महाराजा थे...
गंगासिंह जी राठौड़(बीका राठौड़ अथवा बीकानेर रियासत के संस्थापक राव बीका के वंशज)....

अपने राज्य की प्रजा को अन्न व जल से तड़प-तड़प के मरता देख गंगासिंह जी का हृदय द्रवित हो उठा....

गंगासिंह जी ने सोचा क्यों ना बीकानेर से पँजाब तक नहर बनवा के सतलुज से रेगिस्तान में पानी लाया जाए ताकि मेरी प्रजा को किसानों को अकाल से राहत मिले...

नहर निर्माण के लिए गंगासिंह जी ने एक अंग्रेज इंजीनियर आर जी कनेडी (पँजाब के तत्कालीन चीफ इंजीनियर) ने वर्ष 1906 में इस सतलुज-वैली प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार की...

लेकिन....
बीकानेर से पँजाब व बीच की देशी रियासतों ने अपने हिस्से का जल व नहर के लिए जमीन देने से मना कर दिया....
नहर निर्माण में रही-सही कसर कानूनी अड़चनें डाल के अंग्रेजों ने पूरी कर दी...

महाराजा गंगासिंह जी ने परिस्थितियों से हार नहीं मानी और इस नहर निर्माण के लिए अंग्रेजों से एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और जीती भी...

बहावलपुर (वर्तमान पाकिस्तान) रियासत ने तो अपने हिस्से का पानी व अपनी ज़मीन देने से एकदम मना कर दिया...

महाराजा गंगासिंह जी ने जब कानूनी लड़ाई जीती तो वर्ष 1912 में पँजाब के तत्कालीन गवर्नर सर डैंजिल इबटसन की पहल पर दुबारा कैनाल योजना बनी...

लेकिन...
किस्मत एक वार फिर दगा दे गई...
इसी दरमियान प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था...

4 सितम्बर 1920 को बीकानेर बहावलपुर व पँजाब रियासतों में ऐतिहासिक सतलुज घाटी प्रोजेक्ट समझौता हुआ...

महाराजा गंगासिंह जी ने 1921 में गंगनहर की नींव रखी...

26 अक्टूम्बर 1927 को गंगनहर का निर्माण पूरा हुआ....

हुसैनवाला से शिवपुरी तक 129 किलोमीटर लंबी ये उस वक़्त दुनियाँ की सबसे लंबी नहर थी...

गंगनहर के निर्माण में उस वक़्त कुल 8 करोड़ रुपये खर्च हुए...

गंगनहर से वर्तमान में 30 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है...

इतना ही नहीं...
वर्ष 1922 में महाराजा गंगासिंह जी ने बीकानेर में हाई-कोर्ट की स्थापना की...
इस उच्च-न्यायालय में 1 मुख्य न्यायाधीश के अलावा 2 अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति भी की...

इस प्रकार बीकानेर देश में हाई-कोर्ट की स्थापना करने वाली प्रथम रियासत बनी...

वर्ष 1913 में महाराजा गंगासिंह जी ने चुनी हुई जनप्रतिनिधि सभा का गठन किया...

महाराजा गंगासिंह जी ने बीकानेर रियासत के कर्मचारियों के लिए एंडोमेंट एश्योरेंस स्कीम व जीवन बीमा योजना लागू की...

महाराजा गंगासिंह जी ने निजी बैंकों की सुविधाएं आम नागरिकों को भी मुहैय्या करवाई...

महाराजा गंगासिंह जी ने बाल-विवाह रोकने के लिए शारदा एक्ट कड़ाई से लागू किया....

महाराजा गंगासिंह जी ने बीकानेर शहर के परकोटे के बाहर गंगाशहर नगर की स्थापना की....

बीकानेर रियासत की इष्टदेवी माँ करणी में गंगासिंह जी की अपने पूर्व शासकों की भाँति अपार आस्था थी...
इन्होंने देशनोक धाम में माँ करणी के मंदिर का जीर्णोद्धार भी करवाया...

महाराजा गंगासिंह जी की सेना में गंगा-रिसाला नाम से ऊँटों का बेड़ा भी था...
इसी गंगा-रिसाला ऊँटों के बेड़े के साथ महाराजा गंगासिंह जी ने प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध में अदम्य साहस शौर्य वीरता से युद्ध लड़े...
इन्हें ब्रिटिश हुकूमत द्वारा उस वक़्त सर्वोच्च सैन्य-सम्मान से भी नवाजा गया...

गंगासिंह जी के ऊँटों का बेड़ा गंगा-रिसाला आज सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की शान है.... व देश सेवा में गंगा-रिसाला हर वक़्त मुस्तैद है....

(बीकानेर महाराजा करणीसिंह... निशानेबाजी में भारत के प्रथम अर्जुन पुरस्कार विजेता)...

(वर्तमान में करणीसिंह जी की पौत्री व बीकानेर राजकुमारी सिद्धि कुमारी जी (सिद्धि बाईसा) बीकानेर से भाजपा विधायक है)....

कहते हैं माँ गंगा को धरती पे राजा भागीरथ लाये थे इसलिए गंगा नदी को भागीरथी भी कहा जाता है...

21 वर्षों के लंबे संघर्ष और कानूनी लड़ाई के बाद महाराजा गंगासिंह जी ने अकाल से जूझती बीकानेर/राजस्थान की जनता के लिए गंगनहर के रूप रेगिस्तान में जल गंगा बहा दी थी...

गंगनहर को रेगिस्तान की भागीरथी कहा जाता है...

इसलिए...
महाराजा गंगासिंह जी को मैं कलयुग का भागीरथ कहूँ तो इसमें अतिशयोक्ति नहीं होगी!!!!....

चित्र- गंगा नहर परियोजना की खुदाई के दुर्लभ चित्र उस समय ऊँटगाड़ो की सहायता से नहर खुदाई का कार्य सम्पन्न हुआ था। नमन है उन कामगारों को जिनकी मदद से आज वीरान राजस्थान हरा भरा हुआ है

#तब इंसान ही इंसान को खाने को हुआ था मजबुर

#1899 का विभत्स काल
" #छप्पना_रो_काळ अर मारवाड री दशा "
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प्रकृति के प्रकोप को मनुष्य सदियों-सदियों से ही झेलता आया हैं | इसका असर कभी कम तो कभी-कभी क्षेत्र के सम्पुर्ण जनजीवन को मौत के मुंह तक ले जाना वाला रहा हैं |
ऐसा ही प्रकृति का प्रकोप #सन्1899 में हुआ था | जिसे 'छप्पना रो काळ' कहा जाता हैं | आज भी उस काळ में हुई दशा के बारे में सुनाने वाले बुजुर्ग कांपने लगते हैं | क्योकि उनके बाप-दादा जो उस काळ के प्रकोप से येन-केन प्रकारेण बच गये थे, वो उन्हें काळ में हुई दशा के बारे में बताते थे |
इस वर्ष उत्तरी भारत के अन्य प्रांतो में भी घोर अकाल था | सामान्यत: मारवाड के लोग विशेषकर कृषक व पशुपालक अपने परिवार व पशुओ सहित अकाल के समय मालवा, उत्तर प्रदेश व सिंध की ओर चले जाते थे | लेकिन इस वर्ष यहां भी अकाल था, अतः इन्हें निराश होकर वापस लौटना पडा़ | लगभग चौदह लाख मवेशी मर गये, जो यहां के मवेशीयों की आधी संख्या थी | राज्य सरकार ने काफी चारा व धान बाहर से मंगवायां, लेकिन यातायात की पर्याप्त सुविधाएं न होने के कारण काफी मवेशी व मनुष्य मर गये | कहा जाता हैं कि इस काळ का इतना प्रकोप हुआ की झोपडी से लेकर महल के निवासी सडको पर आ गये और दानें-दानें के मोहताज हो गये | ये काल सब से लिए आफत भरा था | राज्य सरकार ने इस वर्ष लगभग सवा छत्तीस लाख खर्च कीये | राज्य ने अकाल के समय तथा उसके बाद के प्रभाव को दूर करने के लिए अंग्रेजी सरकार से तीस लाख रूपये का कर्जा लीया था | राज्य की आर्थिक स्थति काफी गिर गई | मंहगाई लगभग 25 प्रतिशत तक बढ गई थी | जोधपुर शहर में 25 अगस्त, 1899 को अनाज के भाव इस प्रकार हो गये- गेहूं 6सेर , बाजरी 6.5 सेर, जवार 8सेर, मूंग 4 सेर व घास 11 सेर तक हो गई थी | भयंकर अकाल के कारण जोधपुर में लूटखसोट चालू हो गई थी | इस कारण सभी महकमों की तिजोरियां महकमा खास में रखवाई गई थी | और इस तरह मई-जून 1900 में गर्मी की अधिकता के कारण तथा अकाल से कमजोर हुएं लोगो को हैजा का शिकार होना पडा़ | हजारो लोग हैजे के कारण मर गये | इस वर्ष वर्षा भी अधिक हुई व खेतो में फसलें भी अच्छी हुई, लेकिन फसल काटने वाले ही नही थे | इसलिए इस वर्ष भी धान की कमी रही | अकाल, हैजा व मलेरिया के प्रकोप के कारण 1901 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी 19,38,565 रह गई | जबकि 1891 की जनगणना में मारवाड की जनसंख्या 25,28,178 थी | इस प्रकार 1899 व 1900 इन दो वर्षो में यहां की सामाजिक व आर्थिक स्थति अत्यंत दयनीय हो गई थी |
इसी वर्ष जोधपुर महाराजा सरदार सिंह जी ने अपनी जनता को अकाल से राहत व रोजगार देने के लिए बाडमेंर-बालोतरा 60 मील रेल लाईन चालु करवाई गई | इतनी बडी रेल लाइन चालू करने की अनुमती अंग्रेजी सरकार ने पहली बार एक देशी रियासत को दी थी | इस अकाल में जोधपुर महाराजा ने अपनी प्रजा के लिए धान के भंडार खोल दिये थे, लेकिन भयंकर अकाल में कुछ ही समय में चौतरफा त्राही-त्राही मच गई |
इस काळ को लेकर उस समय की दशा को महाकवि ऊमरदान ने इस तरह बताया -
"माणस मुरधरिया माणक सूं मूंगा !
कोडी कोडी़ रा करिया श्रम सूंगा !
डाढी मुंछाला डळियां में डळिया !
रळिया जायोडा़ गळियां में रूळिया !
आफत मोटी ने रैय्यत रोवाई !
अर्थात मरूधर के मनुष्य (मारवाडी) जो मणिक और मुंगा आदि रत्नों के समान महंगे थे, जो एक-एक कोडी़ को मजदुरी करते दिखाई दिये | गर्व भरी डाढी- मुंछों वाले टोकरी उठाते थे | महलों में पैदा होने वाले गलियों में भटक रहे थे | वह छप्पन का समय भारी आफत के साथ आया ! प्रजा रोटी-रोटी को रोती रही |
कहते हैं उस वक्त धान की अत्यंत कमी के कारण नीम व खेजडी की साल तक खाने को मजबुरी आ पडी थी | इस बारे में मैंने गांव के बुजुर्गों से जानकारी ली, तो बताया की उनके पुर्व के बुजुर्ग जो उस काळ को चीर कर बाहर निकले थे | वो बताते थे की "छप्पने" के समय लोगो के पास पैसे व सोने चांदी की मुहरे भी थी, लेकिन वो भी इधर-उधर लेकर घुमते रहे | धान की इतनी कमी थी कि स्वर्ण मुहरो के बदले भी कोई धान देने को तैयार नही था | क्योकि जिनके पास धान था वो खुद चिंतित थे, कि न जाने काळ कीतना लंबा चलेगा |
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छप्पनियां काळ के बारे में बुजुर्गों से सुने अनुभव शेयर करते हुए मंगलाराम बिश्नोई बताते हैं कि -
" लोग अनाज की पोटली हांडी में घुमाकर उसे 'अन्नवाणी' बना देते और उस पानी में खेजडी के 'छोडा ' (छाल) उबाल कर खाते |
लोग इतने कमजोर पड गये थे कि घरों में झोंपडों में अंदर 'वळों" से रस्सी लटकाये रखते और उसे पकड कर ही खडे हो पाते थे |
एक वीभत्स किस्सा भी है-
" एक माँ ने कैरडे के मळे में अपनी संतान को जन्म देकर खुद ही खा लिया |"
और मंगलाराम जी कहते हैं कि मारवाड की मानवता को झकझोर कर रखने वाली इस छप्पनिया की विभीषिका के बारे में किसी साहित्यकार, कवि, ख्यात लेखक की कलम नहीं चली, न ही वाणी में सरस्वती विराजी |
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आज जब हम प्रकृति के छोटे-छोटे प्रकोप से डर व सहम जाते हैं | तब बुजुर्गो से सुनते आये उस छप्पने काळ की याद अनायास ही आ जाती हैं | क्या दौर रहा होगा ? जब सब तरफ त्राही-त्राही मची होगी |
खैर प्रकृती करे ये काळ व ये आपदाये कभी ना आये |

#इसके_आगे_कोरोना_कुछ_नही_घर_मे_रहो_सुरक्षित रहो
संतोष गोदारा कोलूकी वाल से

ऐसी रहस्यमयी घटनाएं कौन सी है जिनका विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं है?

और दोस्तों कैसे हो!

आज मैं आपको बताऊंगा चार ऐसी घटना है जो कि बेहद अजीब है और आज तक विज्ञान के पास इसका कोई भी जवाब नहीं है।

तो आइए जानते हैं कौन कौन सी है वह घटनाएं ...

1. द एस एस ओरंग मेडान -

यह बात है जून 1947 की। जब एक बहुत ही रहस्यमई घटना घटी यह वह दौर था जब मलक्का की खाड़ी से बहुत ही मालवाहक जहाज चला करते थे। लेकिन एक दिन अचानक ओरंग मेडान शीप से एक संदेश आता है कि हमारे सारे ग्रुप मेंबर नहीं रहे,किसी के शरीर मे कोई चोट के निशान नहीं थे। यहाँ तक की जहाज पर सवार कुत्ते भी मूर्छित हो गए थे। आज तक किसी को समझ नही आया कि आखिर वहाँ हुआ क्या था। ये आज भी रहस्य ही है।

2. द डांसिंग फ्लैग ऑफ 1518 -

ये एक बेहद ही अजीब घटना थी। सन 1518 था। गर्मी का शहर था। स्ट्रासबर्ग एक महिला ने काफी खतरनाक तरीके से शुरू किया और दिन-रात नाचती रही। 5 दिन बाद और भी 35 महिला ने नाचना शुरू कर दिया। वह भी दिन रात लगातार नाचती जा रही थी। धीरे-धीरे 400 महिलाओं ने नाचना शुरु कर दिया। डॉ., वैध, पादरी सब आए लेकिन कुछ नहीं कर पाए। कई महिला तो नाचते-नाचते गिर जाती और स्थिति काफी भयावह हो गई थी। यह ऐसी घटना है जिसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला। ये एक ऐसा रहस्य है जिसका जवाब विज्ञान के पास नहीं है।

3. पत्थर जो खुद ही खिसकता रहता है (डेथ वैली) -

यह जगह कैलिफोर्निया में स्थित है इसे डेथ वैली के नाम से जाना जाता है। यहां बहुत सारे छोटे-बड़े पत्थर है जो कि अपने आप खिसकते रहते हैं। अपने पीछे ये खिसकने के निशान छोड़ जाते हैं। यहां दूर-दूर तक कोई नहीं रहता। ना इंसान, ना जानवर, आज तक पता नहीं चल पाया ये अपने आप कैसे खिसकता है। यह एक रहस्य बन चुका है जिसका जवाब विज्ञान भी नहीं खोज पाया।

4. द डेविल्स कैटल -

ये एक झरना मिनेसोटा में स्थित है। इसकी हैरान करने वाली बात यह है कि इस झरने से दो धारा निकलती है। एक धारा तो नॉर्मल बहती है लेकिन एक धारा एक बड़े से गोल संरचना में गिरकर कहां गायब होती है इसका कुछ भी नहीं पता चल पाया है। यह आज तक कोई नहीं जान पाया कि इतना सारा पानी इस गोल संरचना से होता हुआ जाता कहां है। अजीब बात ये है कि विज्ञान को भी इसका जवाब नहीं पता है अर्थात यह एक अनसुलझा रहस्य है।

हम आपके लिए ऐसी दुनिया के अजब गजब घटनाएं लाते रहते हैं। हमसे जुड़े रहिए।

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क्या शारीरिक सुख ही परम सुख है?

 नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने लगा, अहा ! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं?

कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता। अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।

नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी।

कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा, किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया। आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया।

शिक्षा:

शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानते हैं और अंत में अनन्त संसार रूपी सागर में समा जाते है।

यदि भारत-पाकिस्तान का विभाजन कभी नहीं हुआ तो आज का दिन कैसा होता?

 यह आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक रूप से दोनों देशों के लिए अच्छा होता। प्रमुख बिंदुओं से शुरू करते हैं

1. दुनिया की सबसे शक्तिशाली क्रिकेट टीम।

2. दुनिया में सर्वश्रेष्ठ गायक the

3. दो राष्ट्रों (चेनाब, झेलम, सिंधु) के बीच नदियों को विभाजित करने की आवश्यकता नहीं है।

4. चीन ने कभी भी भारत पर हमला करने की कोशिश नहीं करता जैसा कि उन्होंने 1962 में किया था और कभी भी भारतीय क्षेत्र का अतिक्रमण करने की कोशिश नहीं करता।

5. दुनिया की सबसे बड़ी आबादी बहुत जल्दी बन जाती है।

6. दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों में से एक बन गया होता।

7. दुनिया की सबसे बड़ी सेना बन जाती है।

8. आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं।

9. भारत के लिए मध्य पूर्व में व्यापार करना आसान हो जाता।

10. जल्द ही एक वैश्विक शक्ति बन जाता ।

11. बड़े पैमाने पर नरसंहार और दंगे नहीं होते।

12. 1947, 1965, 1971 और 1999 के युद्ध कभी नहीं होते। 1971 के युद्ध के बाद से, बांग्लादेश नामक एक राष्ट्र मौजूद नहीं होता।

१३। हम अपने प्रिय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (ताशकंद समझौते के दौरान) को नहीं खोए होते, उनकी मृत्यु अभी भी एक रहस्य है?

14. अंत में हम अखण्ड भारत के निर्माण में सफल होते ।

15. दुनिया के सबसे महान विश्वविद्यालयों में से एक, तक्षशिला विश्वविद्यालय हमारे राष्ट्र का हिस्सा होगा।

16. सिंध, मोहनजोदड़ो को नहीं खोया होता।

यदि दोनों देशों को अंग्रेजों ने विभाजित नहीं किया, तो हम मिसाइल, हथियार और गोला-बारूद, परमाणु हथियार बनाने और दुनिया की सबसे बड़ी सेना बनाए रखने के बजाय हेल्थकेयर सिस्टम, शिक्षा, इन्फ्रास्ट्रक्चर, असंगठित लोगों के लिए कल्याण में अधिक पैसा खर्च करते। अगर मुझे कुछ याद आया तो कमेंट बॉक्स में plz का उल्लेख करें पढ़ने के लिए धन्यवाद।

क्या आपने कभी किसी गर्भवती आदमी के बारे में सुना है ?!

अच्छा, आज उन्नत तकनीकों के कारण यह संभव हो सकता है लेकिन 1999 में ऐसा नामुमकिन था? मिलिए संजू भगत से- प्रेग्नेंट मैन केवल 2 साल की उम्र में,...